कानूनी तर्क प्रश्न 22

प्रश्न; ब्रिटिश लोगों द्वारा भारत में अपना प्रशासन शुरू करने से पहले, हिंदू कानून का बड़ा हिस्सा वैदिक परंपरा पर आधारित रीति-रिवाजों (कस्टम्स) के स्वरूप में था। ये रीति-रिवाज समय-समय पर लिखी गई स्मृतियों में परिलक्षित होते थे। मुस्लिम कानून कुरानिक आदेशों (इंजंक्शन्स) पर आधारित था। ब्रिटिश काल में बहुत अधिक परिवर्तन देखने को मिले। नए विचार पेश किए गए जैसे कि न्यायालय प्रणाली की स्थापना, प्रक्रियाओं का विकास, न्याय और इक्विटी पर निर्भरता। ब्रिटिश राज के दौरान भारत का परिचय कानून के पश्चिमी विचारों से कराया गया। रेगुलेटिंग एक्ट्स और गवर्नमेंट ऑफ इंडिया एक्ट्स पारित किए गए। दंड संहिता (पीनल कोड) के साथ-साथ प्रक्रियात्मक संहिताएँ (प्रोसीजरल कोड्स) बनाई गईं। मुकदमा साबित करने के लिए साक्ष्य (एविडेंस) के नियम भी संहिताबद्ध किए गए। ब्रिटिश लोगों ने एक विधि आयोग (लॉ कमीशन) की भी स्थापना की। यह इसी अवधि के दौरान था कि कुछ प्रमुख विधान पेश किए गए। आपराधिक (क्रिमिनल) पक्ष पर, भारतीय दंड संहिता, 1860 और भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1877 दो मुख्य विधान थे। दीवानी (सिविल) पक्ष पर, संविदा अधिनियम (कॉन्ट्रैक्ट एक्ट), 1872 और सिविल प्रक्रिया संहिता (सिविल प्रोसीजर कोड) जैसे विधान पारित किए गए। भारतीय तार अधिनियम, 1885; जाति अयोग्यता निवारण अधिनियम 1850; हिंदू अधिगम लाभ अधिनियम, 1930; हिंदू उत्तराधिकार (अयोग्यता निवारण) अधिनियम, 1928; बाल विवाह निरोधक अधिनियम, 1929; बालिका हत्या निवारण अधिनियम, 1870; हिंदू विधवा पुनर्विवाह अधिनियम 1856; आदि ब्रिटिश काल के दौरान प्रगतिशील विधान लाकर किए गए सुधारों के कुछ उदाहरण हैं। भारतीय दासता अधिनियम (इंडियन स्लेवरी एक्ट) एक उत्कृष्ट उदाहरण है कानूनी सुधार का जो ब्रिटिश लोग भारतीय विधिक प्रणाली में लाए।

स्वतंत्रता के बाद, कानून के सुधार को दो प्रमुख तरीकों से जारी रखा गया। एक तरीका न्यायिक व्याख्या (जुडिशियल इंटरप्रिटेशन) का था। न्यायालयों ने संविधान के उन प्रावधानों की उदार व्याख्या देना शुरू कर दिया जो नागरिकों के जीवन और स्वतंत्रता की रक्षा के लिए बनाए गए थे। न्यायालयों ने एक सजग प्रहरी की भूमिका भी निभाई और यह सुनिश्चित किया कि विधानमंडल (लेजिस्लेचर) प्रेस की स्वतंत्रता सहित व्यक्तिगत स्वतंत्रताओं पर अतिक्रमण न करे। दूसरी ओर भारत के विधि आयोग (लॉ कमीशन) ने सिफारिशें कीं; मौजूदा कानूनों में संशोधनों के माध्यम से परिवर्तन लाने के लिए। देश की प्रगति में भारत के विधिक ढांचे से अनावश्यक बाधाओं को दूर करने के लिए विधि आयोग द्वारा ऐसे परिवर्तन आवश्यक समझे गए। विधि आयोग के योगदान को उन रिपोर्टों में देखा जा सकता है जो उसने समय-समय पर प्रस्तुत की हैं। विधि आयोग एक संवैधानिक निकाय नहीं है, यह केवल परिवर्तनों की सिफारिश कर सकता है। सरकार इन परिवर्तनों को स्वीकार करने या न करने के लिए स्वतंत्र है। भारत में ब्रिटिश प्रशासन ने प्रगतिशील कानून लाए। निम्नलिखित में से कौन सा ब्रिटिश लोगों द्वारा बनाए गए प्रगतिशील कानून का उदाहरण नहीं है।

विकल्प:

A) हिंदू अधिगम लाभ अधिनियम

B) हिंदू विवाह अधिनियम

C) हिंदू विधवा पुनर्विवाह अधिनियम

D) भारतीय दासता अधिनियम

उत्तर:

सही उत्तर; B

समाधान:

  • (b) इनमें से सभी अधिनियम (b) को छोड़कर ब्रिटिश काल के दौरान बनाए गए थे। हिंदू विवाह अधिनियम भी एक प्रगतिशील अधिनियम है लेकिन यह स्वतंत्रता-पश्चात काल में बनाया गया था।