कानूनी तर्क प्रश्न 2
प्रश्न; हिरासत में हिंसा (Custodial violence) का अर्थ है कानून और वैध प्राधिकरण की हिरासत में शारीरिक, मनोवैज्ञानिक तथा भावनात्मक रूप से हिंसा का अनुभव करना, जिसमें बलपूर्वक गायब करना, अवैध हिरासत, यातना, अदालती हत्याएँ (extrajudicial execution) तथा अन्य कई प्रकार की क्रूर, अमानवीय और अपमानजनक व्यवहार और दंड शामिल हैं। हिरासत में हिंसा विशिष्ट परिस्थितियों को समेटती है जैसे कि जहाँ स्वयं हिरासत प्रथमदृष्टया अवैध है या कानून के किसी अधिकार से युक्त नहीं है, जो कि हिरासत के आह्वान के क्षण से उत्पन्न होने वाले अधिकारों का उल्लंघन है और यह हिरासत के बाद भी जारी रहता है, उदाहरणतः राज्य या राज्य के एजेंटों, अर्थात् सार्वजनिक अधिकारियों द्वारा अवैध हिरासत और बलपूर्वक गायब करने के अपराध।
एक अन्य विशिष्ट परिस्थिति तब होती है जब स्वयं हिरासत वैध होती है परंतु हिरासत के बाद हिरासत संबंधी मानकों का पालन नहीं किया जाता है। इस प्रकार अधिकारों का उल्लंघन हिरासत के बाद किसी समय बिंदु से प्रारंभ होता है और यह हिरासत के दौरान भी जारी रह सकता है।
पुलिस की भूमिका और पुलिसिंग की प्रकृति राजनेताओं, मीडिया और जनता के बीच बहस और विवाद का केंद्र बन गई है। पुलिस को अक्सर मानवाधिकारों का प्रमुख उल्लंघनकर्ता और हिरासत में हिंसा का दोषी माना जाता है, भारतीय पुलिसिंग को प्रायः संकट की स्थिति में देखा जाता है। सत्ता के प्रमुख दुरुपयोग और लोगों के प्रति अन्याय ने पुलिस पर जनता के विश्वास को कमजोर किया है। इस बात पर बहुत कम सहमति रही है कि पुलिस को क्या करना चाहिए और क्या नहीं, और यही कारण है कि भारत में संपूर्ण पुलिस तंत्र की संरचनात्मक नींव में भारी हलचल है।
भारत में अपराध दर अन्य राष्ट्रों की तुलना में कहीं अधिक है, विशेषतः जब बात मानवाधिकारों और मानवीय गरिमा के उल्लंघन की हो। अपराध दर की निरंतर बढ़ती प्रवृत्ति पुलिस तंत्र की भूमिका और स्थिति तथा देश में कानून, व्यवस्था और न्याय के समग्र प्रशासन पर भी प्रश्नचिन्ह खड़ा करती है। देश की पुलिस बल पर अपराध को रोकने की विशाल जिम्मेदारी निहित है।
भारतीय संविधान के अनुसार, पुलिस बल के सदस्य सार्वजनिक सेवक होते हैं और एक थाने को सार्वजनिक संपत्ति माना जाता है। इसलिए एक पुलिस अधिकारी का कर्तव्य और आचरण देश के कानून के अनुरूप होना चाहिए, मूलभूत मानव स्वतंत्रता का सम्मान करना चाहिए और देश में कानून-व्यवस्था का पालन तथा संरक्षण करना चाहिए। फिर भी, बार-बार हम एक विपरीत चरित्र देखते हैं जहाँ पुलिस के सदस्य हिरासत में हिंसा, यातना, अमानवीय व्यवहार, कैदियों को हथकड़ी लगाना, थर्ड-डिग्री तरीकों का प्रयोग आदि में संलग्न होते हैं, जो कि अक्सर उनके आधिकारिक कर्तव्यों के दौरान प्रदर्शित और अभ्यासित किए जाते हैं।
संविधन मुख्यतः सभी नागरिकों के बीच उनकी स्थिति, लिंग, जाति या पंथ और सामाजिक, आर्थिक तथा राजनीतिक न्याय की परवाह किए बिना समानता के सिद्धांत और संकल्पना पर आधारित है। संविधन संस्थागत हिरासत में रखे गए व्यक्तियों के लिए अन्य अधिकारों के अतिरिक्त कुछ विशेष अधिकारों की भी गारंटी देता है, जिसमें मूलभूत अधिकार सम्मिलित हैं। समानता की संकल्पना और यातना या किसी भी स्वेच्छाचारी व्यवहार से सुरक्षा का प्रावधान भारतीय संविधन का आधार बनाते हैं। इस प्रकार देश का प्रत्येक नागरिक कानून के समक्ष समानता और सुरक्षा का अधिकार रखता है।
हिरासत में हिंसा तभी घटित हो सकती है जब
विकल्प:
A) एक व्यक्ति हिरासत में है
B) व्यक्ति को हिरासत में लेने से पहले भी-
C) मामले पर निर्भर करता है
D) दोनों (a) और (b)
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उत्तर:
सही उत्तर; D
समाधान:
- (d) एक अन्य विशिष्ट परिस्थिति है -जब स्वयं हिरासत वैध है, परंतु हिरासत के बाद हिरासती प्रथाओं के मानकों का पालन नहीं किया जाता। इस प्रकार अधिकारों का उल्लंघन हिरासत के बाद किसी समय आरंभ होता है और यह हिरासत के दौरान जारी रह सकता है।