कानूनी तर्क प्रश्न 3
प्रश्न; हिरासत में हिंसा का अर्थ है कानून और वैध प्राधिकरण की हिरासत में शारीरिक, मनोवैज्ञानिक तथा भावनात्मक रूप से की गई हिंसा, जिसमें लापता कर दिया जाना, गैरकानूनी निरोध, यातना, न्यायिक हत्याएँ तथा अन्य क्रूर, अमानवीय और अपमानजनक व्यवहार और दंड शामिल हैं। हिरासत में हिंसा विशेष परिस्थितियों को समेटे होती है जैसे कि वह हिरासत जो प्रथमदृष्टया ही गैरकानूनी है या कानूनी अधिकार से रहित है, जो हिरासत में लेते ही अधिकारों के उल्लंघन का आरंभ करती है और हिरासत के बाद भी जारी रहती है, उदाहरणतः राज्य या राज्य के एजेंटों—अर्थात् सार्वजनिक अधिकारियों—द्वारा गैरकानूनी निरोध और लापता कर देने के अपराध।
एक अन्य विशिष्ट परिस्थिति तब होती है जब हिरासत स्वयं तो वैध होती है परंतु हिरासत के बाद हिरासत संबंधी मानकों का पालन नहीं किया जाता। इस प्रकार अधिकारों का उल्लंघन हिरासत के बाद किसी समय बिंदु से प्रारंभ होता है और हिरासत के दौरान भी जारी रह सकता है। पुलिस की भूमिका और पुलिसिंग की प्रकृति राजनेताओं, मीडिया और जनता के बीच बहस और विवाद का केंद्र बन गई है। पुलिस को प्रायः मानवाधिकारों का प्रमुख उल्लंघनकर्ता और हिरासत में हिंसा का दोषी माना जाता है, जिससे भारतीय पुलिसिंग को संकट की स्थिति में बताया जाता है। सत्ता के दुरुपयोग और लोगों के प्रति अन्याय के प्रमुख उदाहरणों ने जनता का पुलिस पर विश्वास कमजोर किया है। इस बात पर बहुत कम सहमति है कि पुलिस को क्या करना चाहिए और क्या नहीं, और यही कारण है कि भारत के समूचे पुलिस तंत्र की संरचनात्मक नींव में भारी हलचल है। भारत में अपराध दर अन्य देशों की तुलना में कहीं अधिक है, विशेषकर मानवाधिकारों और मानव गरिमा के उल्लंघन के मामलों में। अपराध दर की लगातार बढ़ती रेखा पुलिस तंत्र की भूमिका और देश में कानून, व्यवस्था और न्याय के समग्र प्रशासन की स्थिति पर भी प्रश्नचिह्न लगाती है। देश की पुलिस बल पर अपराध को रोकने की भारी जिम्मेदारी है। भारतीय संविधान के अनुसार, पुलिस बल के सदस्य सार्वजनिक सेवक होते हैं और थाना सार्वजनिक संपत्ति माना जाता है। इसलिए एक पुलिस अधिकारी का कर्तव्य और आचरण देश के कानून के अनुरूप होना चाहिए, मूलभूत मानव स्वतंत्रता का सम्मान करना चाहिए और देश में कानून-व्यवस्था का पालन तथा संरक्षण करना चाहिए। परंतु बार-बार हम एक विरोधाभासी चरित्र देखते हैं जहाँ पुलिस के सदस्य हिरासत में हिंसा, यातना, अमानवीय व्यवहार, कैदियों को हथकड़ी लगाना, थर्ड-डिगरी तरीकों का प्रयोग आदि में संलग्न होते हैं, जो प्रायः उनके आधिकारिक कर्तव्यों के दौरान प्रदर्शित और अपनाए जाते हैं। संविधन मुख्यतः सभी नागरिकों के बीच उनकी स्थिति, लिंग, जाति या पंथ और सामाजिक, आर्थिक तथा राजनीतिक न्याय के बावजूद समानता के सिद्धांत और संकल्पना पर आधारित है। संविधन संस्थागत हिरासत में रखे गए व्यक्तियों के लिए अन्य अधिकारों के अतिरिक्त कुछ विशेष अधिकार भी गारंटी करता है, जिसमें मौलिक अधिकार सम्मिलित हैं। समानता की संकल्पना और यातना या किसी भी मनमाने व्यवहार से सुरक्षा का प्रावधान भारतीय संविधान की आधारशिला है। इस प्रकार देश का प्रत्येक नागरिक समानता और कानून के समक्ष सुरक्षा का अधिकार रखता है। पुलिस में अविश्वास का कारण क्या है?
विकल्प:
A) पुलिस द्वारा सत्ता का दुरुपयोग
B) पुलिस की भूमिका पर असहमति
C) (a) और (b) दोनों
D) पुलिस में कानूनी समझ की कमी
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उत्तर:
सही उत्तर; C
समाधान:
- (c) सत्ता के प्रमुख दुरुपयोग और लोगों के साथ अन्याय ने पुलिस पर जनता के विश्वास को कमजोर किया है। इस बात पर बहुत कम सहमति रही है कि पुलिस को क्या करना चाहिए और क्या नहीं, और यही कारण है कि भारत में संपूर्ण पुलिस व्यवस्था की संरचनात्मक नींव में भारी हलचल है।