कानूनी तर्क प्रश्न 38

प्रश्न; वह हिंदू कानून जिसे भारत में ब्रिटिश काल के दौरान संहितबद्ध, विकसित और लागू किया गया, एंग्लो-हिंदू लॉ कहलाता है। 1772 में वॉरेन हेस्टिंग्स ने घोषित किया कि उत्तराधिकार, विवाह, जाति और अन्य धार्मिक प्रथा या संस्थाओं के मामलों में मुसलमान कुरान के कानून से और हिंदू शास्त्रों से शासित होंगे। उन दिनों मुसलमानों के लिए शरीयत आसानी से उपलब्ध थी, परंतु हिंदुओं और अन्य गैर-मुस्लिमों—जैसे जैन, बौद्ध, सिख, पारसी और आदिवासियों—के लिए ऐसी संहितबद्ध जानकारी उपलब्ध नहीं थी। एंग्लो-हिंदू लॉ की अवधि को दो चरणों में बाँटा जा सकता है।

a. प्रथम चरण (1772-1864)
1772 से 1864 तक को प्रथम चरण माना जाता है। इस चरण की तीन प्रमुख विशेषताएँ थीं:

  1. प्रथम, इसी चरण के दौरान धर्मशास्त्रों को संकलित और अनूदित किया गया। हेनरी थॉमस कोलब्रुक, जे. सी. सदरलैंड, विलियम जोन्स और हैरी बोरोडेल जैसे कई ब्रिटिश विद्वानों ने इस विकास में मुख्य योगदान दिया।
  2. द्वितीय, ब्रिटिश न्यायालयों के विभिन्न स्तरों पर न्यायिक निर्णयों में सहायता के लिए कोर्ट पंडितों को आमंत्रित किया गया। उनकी भूमिका न्यायालय में प्रस्तुत मुद्दों पर शास्त्रीय हिंदू कानून की व्याख्या करना था।
  3. तृतीय, कुछ समय बाद कोर्ट पंडित अनावश्यक हो गए। ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि इन पंडितों की सहायता से दिए गए न्यायिक निर्णय पूर्वाधिकार बन गए और न्यायालय पूर्वाधिकारों पर निर्भर होने लगे। अब कोर्ट पंडितों की आवश्यकता नहीं रही।

b. द्वितीय चरण (1864-1947)
द्वितीय चरण कोर्ट पंडितों की बर्खास्तगी से प्रारंभ होता है। इसी समय एंग्लो-हिंदू लॉ का संहितीकरण प्रारंभ हुआ। ब्रिटिश संसद ने इस अवधि में तत्कालीन हिंदू कानून को सुधारने के लिए एक श्रृंखला में अधिनियम पारित किए। ऐसे विधानों और केस-लॉ के विकास के साथ धर्मशास्त्रों का महत्त्व घटने लगा। ब्रिटिश प्रशासकों ने स्थानीय लोगों के साथ साक्षात्कार, प्रेक्षण और चर्चा के माध्यम से परंपरागत कानूनों को संकलित करने का विशाल कार्य किया। यह संग्रह भविष्य के लिए न्यायालयों के संसाधन बन गया। क्रमशः धर्मशास्त्रों का वह प्रभाव समाप्त हो गया जो कभी था और भारतीय न्यायिक व्यवस्था ब्रिटिश न्यायिक व्यवस्था की ओर रंग लेने लगी।

आधुनिक हिंदू कानून
भारत की स्वतंत्रता के पश्चात हिंदू व्यक्तिगत कानूनों को संहितबद्ध और संशोधित करने की आवश्यकता महसूस की गई। इस प्रकार हिंदू कोड बिल प्रस्तावित किया गया। हिंदू कोड बिल का उद्देश्य हिंदू कानून को संहितबद्ध करना और जहाँ आवश्यक हो वहाँ सुधार करना था। इससे यह बहस उत्पन्न हुई कि क्या व्यक्तिगत कानूनों को सभी नागरिकों पर धर्म की परवाह किए बिना लागू किया जाए या नहीं। हिंदू कोड बिल प्रगतिशील, धर्मनिरपेक्ष था और एक संयुक्त हिंदू समाज बनाने का प्रयास करता था। आधुनिक समय में हिंदू कानून भारतीय संसद द्वारा पारित कई विधानों तथा न्यायिक पूर्वाधिकारों में पाया जाता है, जो किसी बिंदु पर निर्णय लेने के लिए प्रायः धर्मशास्त्रों का उल्लेख करते हैं। हिंदू कानून से संबंधित प्रमुख विधान हैं; हिंदू विवाह अधिनियम, 1955; हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956; हिंदू अल्पसंख्यक और अभिभावकता अधिनियम, 1956; और हिंदू दत्तक ग्रहण और भरण-पोषण अधिनियम, 1956।

एंग्लो-हिंदू लॉ के द्वितीय चरण की विशेषता क्या थी?

विकल्प:

A) धर्मशास्त्र बहुत महत्वपूर्ण हो गए

B) दरबार के पंडितों को बर्खास्त कर दिया गया

C) ब्रिटिश संसद ने हिंदू कानूनों पर प्रतिबंध लगा दिया

D) केस कानूनों का महत्व घट गया

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उत्तर:

सही उत्तर; B

समाधान:

  • (b) दूसरा चरण (1864-1947) दूसरा चरण दरबार के पंडितों की बर्खास्तगी से शुरू होता है। इसी समय एंग्लो-हिंदू कानून का संहिताकरण प्रारंभ हुआ। इस अवधि के दौरान ब्रिटिश संसद ने तत्कालीन हिंदू कानून को बेहतर बनाने के लिए एक श्रृंखला अधिनियम पारित किए। ऐसे विधानों और केस कानून के विकास के साथ धर्मशास्त्रों का महत्व घटने लगा।