कानूनी तर्क प्रश्न 13
प्रश्न; राष्ट्रीय उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग ने आज सुश्री सूर्या शेष मणि द्वारा दायर एक याचिका पर अपना आदेश सुरक्षित रखा, जिसमें आरोप लगाया गया है कि केयर हॉस्पिटल इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज़ की चिकित्सीय लापरवाही के कारण उनके पति की मृत्यु हुई।
मामला अध्यक्ष न्यायमूर्ति श्री आर. के. अग्रवाल की अध्यक्षता वाली पीठ के समक्ष सूचीबद्ध था।
याचिकाकर्ता सुश्री डी. सूर्या शेष मणि ने एनसीडीआरसी में आरोप लगाया कि हैदराबाद स्थित केयर हॉस्पिटल इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज़ ने उनके पति को गलत इलाज दिया, जिससे उनकी मृत्यु हो गई।
शिकायतकर्ता और याचिकाकर्ता के अनुसार, उनके पति को पीठ दर्द और उल्टी की शिकायत के साथ अस्पताल में भर्ती कराया गया था। इसके तुरंत बाद उन्हें पेंटा-एसिड और क्लोफ़र इंजेक्शन दिए गए। दवाएं दिए जाने के बीस मिनट बाद मरीज़ को भारी दिल का दौरा पड़ा और वह गिर पड़े।
याचिकाकर्ता के अनुसार, भर्ती होने के समय उन्हें छाती में दर्द, बुखार, बीपी की समस्या नहीं थी और वे डायबेटिक भी नहीं थे। ईसीजी भी सामान्य आया था। दवा दिए जाने के तुरंत बाद कार्डियक डॉक्टर को बुलाया गया और ईसीजी किया गया, जिसमें बेहद कम बीपी और लगभग कोई हृदय कार्य नहीं होना बताया गया। बाद में मरीज़ को कार्डियक इंजेक्शन दिया गया और उन्हें आगे की जांच और इलाज के लिए कैथ लैब, यानी हृदय विभाग, में भेजा गया।
इन सभी तथ्यों को याचिका के रूप में प्रस्तुत करते हुए याचिकाकर्ता ने यह भी कहा कि संभवतः मरीज़ की मृत्यु उससे बहुत पहले हो चुकी थी, जब उसे अस्पताल से मृत घोषित किया गया, क्योंकि अस्पताल ने डिस्चार्ज रिपोर्ट में मरीज़ की मिनट-दर-मिनट जानकारी भी नहीं दी।
प्रतिवादी/अस्पताल ने तर्क दिया कि मरीज़ डायबेटिक था और पिछले एक वर्ष से स्वास्थ्य ठीक नहीं था। याचिकाकर्ता ने इस प्रस्ताव का विरोध किया और दलील दी कि उनके पति छह महीने पहले दुबई से वापस आए थे, जहाँ उनकी स्वास्थ्य जांच हुई थी और उन्हें फिट पाया गया था।
प्रतिवादी ने पहले मरीज़ की पहचान को लेकर भी संदेह जताया था, क्योंकि अस्पताल में ली गई तस्वीर में व्यक्ति का चेहरा आधार कार्ड की तस्वीर से मेल नहीं खा रहा था, लेकिन बाद में कोर्ट के समक्ष यह आपत्ति वापस ले ली।
प्रतिवादी ने कोर्ट के समने स्वीकार किया कि वह व्यक्ति की पहचान को लेकर विवाद में नहीं खड़ा है, लेकिन यह कहा कि याचिकाकर्ता द्वारा उल्लिखित इंजेक्शन हानिकारक नहीं हैं और दिल का दौरा नहीं पैदा कर सकते, क्योंकि ये एसिडिटी और उल्टी के लक्ष्यों की जांच के लिए दिए गए थे, जिनसे मरीज़ भर्ती होने के समय पीड़ित था। प्रतिवादी ने यह भी दलील दी कि मरीज़ तंबाकू सूंघता था और शराबी भी था।
दलीलें सुनने के बाद कोर्ट ने मामले में आगे की तारीख़ दिए बिना फैसला सुरक्षित रख लिया। न्यायमूर्ति श्री आर. के. अग्रवाल ने कहा कि फैसला किसी भी समय तीन महीने की अवधि के भीतर आ सकता है।
निम्नलिखित में से कौन-सा तथ्य याचिकाकर्ता द्वारा की गई याचिका के अनुसार सही है?
विकल्प:
A) मरीज़ की जानकारी मिनट-दर-मिनट प्रकट नहीं की गई
B) यद्यपि मरीज़ की मिनट-दर-मिनट जानकारी दी गई, कुछ महत्वपूर्ण जानकारी प्रकट नहीं की गई
C) अस्पताल ने मृत्यु का कारण तुरंत नहीं बताया
D) अस्पताल ने दुर्भावनापूर्ण इरादे से मरीज़ की हत्या कर दी
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उत्तर:
सही उत्तर; A
समाधान:
- (a) यह सब दलील के रूप में प्रस्तुत करते हुए याचिकाकर्ता ने यह भी कहा कि सम्भवतः मरीज़ उससे पहले ही मर चुका था जब उसे अस्पताल से मृत के रूप में छुट्टी दी गई, क्योंकि अस्पताल ने डिस्चार्ज रिपोर्ट में मरीज़ की मिनट-दर-मिनट विवरण नहीं दिया।