कानूनी तर्क प्रश्न 14

प्रश्न; राष्ट्रीय उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग ने आज सुश्री सूर्या शेष मणि द्वारा दायर एक याचिका पर अपना आदेश सुरक्षित रखा, जिसमें चिकित्सा लापरवाही का आरोप लगाया गया है जिससे उनके पति की मृत्यु हुई और इसके लिए केयर हॉस्पिटल इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज़ को जिम्मेदार ठहराया गया है।

मामला अध्यक्ष न्यायमूर्ति श्री आर. के. अग्रवाल की अध्यक्षता वाली पीठ के समक्ष सूचीबद्ध था।
याचिकाकर्ता सुश्री डी. सूर्या शेष मणि ने एनसीडीआरसी में आरोप लगाया कि हैदराबाद स्थित केयर हॉस्पिटल इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज़ ने उनके पति को गलत इलाज दिया जिससे उनकी मृत्यु हो गई।
शिकायतकर्ता और याचिकाकर्ता के अनुसार, उनके पति को पीठ दर्द और उल्टी की शिकायत पर अस्पताल में भर्ती कराया गया था। इसके तुरंत बाद उन्हें पेंटा-एसिड और क्लोफर इंजेक्शन दिए गए। दवाएं दिए जाने के बीस मिनट बाद मरीज़ को भारी दिल का दौरा पड़ा और वह गिर पड़े।
याचिकाकर्ता के अनुसार भर्ती होने के समय उन्हें छाती में दर्द नहीं था, बुखार नहीं था, बीपी की समस्या नहीं थी और वे डायबेटिक भी नहीं थे। ईसीजी भी सामान्य आया था। दवा दिए जाने के बाद तुरंत कार्डियाक डॉक्टर को बुलाया गया और ईसीजी किया गया जिसमें बेहद कम बीपी और लगभग कोई हृदय कार्य नहीं पाया गया। बाद में मरीज़ को कार्डियाक इंजेक्शन दिया गया और उन्हें आगे की जांच और इलाज के लिए कैथ लैब, यानी हृदय वार्ड, रेफर किया गया।
इन सभी बातों को याचिका के रूप में प्रस्तुत करते हुए याचिकाकर्ता ने यह भी कहा कि संभवतः मरीज़ उस समय से पहले ही मर चुका था जब उसे अस्पताल से मृत घोषित किया गया, क्योंकि अस्पताल ने डिस्चार्ज रिपोर्ट में मरीज़ की मिनट-दर-मिनट जानकारी भी नहीं दी।
प्रतिवादी/अस्पताल ने तर्क दिया कि मरीज़ डायबेटिक था और पिछले एक वर्ष से स्वास्थ्य की दृष्टि से अच्छी स्थिति में नहीं था। याचिकाकर्ता ने इस प्रस्ताव पर आपत्ति जताई और दलील दी कि उनके पति छह महीने पहले दुबई से वापस आए थे जहाँ उनकी हेल्थ चेक-अप हुई थी और उन्हें फिट पाया गया था।
प्रतिवादी ने पहले मरीज़ की पहचान को लेकर भी संदेह जताया था क्योंकि अस्पताल में ली गई तस्वीर में चेहरा आधार कार्ड की तस्वीर से मेल नहीं खा रहा था, बाद में उसने अदालत के समक्ष इस आपत्ति को वापस ले लिया।
प्रतिवादी ने अदालत के समक्ष स्वीकार किया कि वह व्यक्ति की पहचान को लेकर विवाद नहीं कर रहा है, लेकिन यह कहा कि जिन इंजेक्शनों का जिक्र किया गया है वे खतरनाक नहीं हैं और दिल का दौरा नहीं पैदा कर सकते क्योंकि ये एसिडिटी और उल्टी के लक्ष्मणों को देखते हुए दिए गए थे जिनसे मरीज़ भर्ती होने के समय पीड़ित था। प्रतिवादी ने यह भी दलील दी कि मरीज़ तंबाकू सूंघता था और शराबी था।
दलीलें सुनने के बाद अदालत ने मामले में आगे की तारीख दिए बिना फैसला सुरक्षित रख लिया। न्यायमूर्ति श्री आर. के. अग्रवाल ने कहा कि फैसला किसी भी समय तीन महीने की अवधि के भीतर आ सकता है।
याचिकाकर्ता और अस्पताल के बीच मरीज़ की स्थिति को लेकर क्या विवाद था

विकल्प:

A) अस्पताल ने तर्क दिया कि मरीज़ की दुबई स्वास्थ्य रिपोर्ट नकली थी

B) अस्पताल ने तर्क दिया कि याचिकाकर्ता ने अस्पताल से मुआवज़ा वसूलने के लिए झूठा स्वास्थ्य प्रमाणपत्र बनाया

C) याचिकाकर्ता ने दावा किया कि उसके पति को स्वस्थ घोषित किया गया जबकि अस्पताल ने इससे इनकार किया

D) अस्पताल और याचिकाकर्ता दोनों ने दावा किया कि मरीज़ स्वस्थ था लेकिन साथ ही सामान्य स्तर का डायबिटिक भी था, परंतु याचिकाकर्ता के अनुसार अस्पताल ने लापरवाही से उसकी हत्या कर दी।

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उत्तर:

सही उत्तर; C

समाधान:

  • (c) प्रतिवादी/अस्पताल ने तर्क दिया कि मरीज़ पिछले एक वर्ष से डायबिटिक भी था और अच्छी स्वास्थ्य स्थिति में नहीं था। याचिकाकर्ता ने उक्त दलील का विरोध किया और दलील दी कि उसके पति छह महीने पहले दुबई से वापस आया था जहाँ उसकी स्वास्थ्य जाँच हुई थी और उसे फिट पाया गया था।